Shaksgam Valley Explained: The Silent Battlefield

Shaksgam Valley Explained : The Silent Battlefieldशक्सगाम घाटी (Shaksgam Valley) आखिर है कहां और चर्चा में क्यों है?

शक्सगाम घाटी (Shaksgam Valley) इन दिनों भारत, चीन और पाकिस्तान के बीच एक गंभीर रणनीतिक मुद्दे के रूप में उभर कर सामने आई है। यह घाटी हिमालय के उत्तर में काराकोरम पर्वतमाला के पास स्थित है और भौगोलिक रूप से गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र से जुड़ी हुई है। पहली नज़र में यह इलाका पूरी तरह वीरान दिखाई देता है। यहां न तो खेती होती है और न ही कोई स्थायी आबादी निवास करती है। इसके बावजूद चीन इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर आधारभूत ढांचे का निर्माण कर रहा है, जिस पर भारत ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। सवाल यह है कि आखिर एक निर्जन घाटी इतनी महत्वपूर्ण क्यों हो गई है।


आज़ादी के बाद भारत ने कैसे खोया Shaksgam Valley का क्षेत्र?

भारत की आज़ादी के समय और उससे पहले ही देश का व्यापक भूभाग विभाजन की भेंट चढ़ चुका था। अफगानिस्तान और बर्मा भारत से अलग हुए, वहीं पंजाब और पूर्वी बंगाल को विभाजित कर पाकिस्तान का निर्माण किया गया। इसके बाद पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया, जिसमें गिलगित-बाल्टिस्तान (Gilgit Baltistan), लद्दाख के कुछ भाग और जम्मू-कश्मीर का विस्तृत क्षेत्र शामिल था। वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध में भारत को लद्दाख का लगभग 32,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र गंवाना पड़ा, जिसे आज अक्साई चीन के नाम से जाना जाता है। इसी कालखंड में शक्सगाम घाटी (Shaksgam Valley) भी भारत के नियंत्रण से बाहर चली गई।


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हुंजा रियासत और शक्सगाम घाटी (Shaksgam Valley) का ऐतिहासिक संबंध

गिलगित-बाल्टिस्तान (Gilgit Baltistan) क्षेत्र, जो काराकोरम पर्वतमाला के बीच स्थित है, कभी जम्मू-कश्मीर रियासत का हिस्सा हुआ करता था। पाकिस्तान ने 1948 में इस पर कब्जा कर लिया। इसी क्षेत्र से निकलने वाली गिलगित नदी आगे चलकर सिंधु नदी में मिल जाती है। गिलगित नदी की एक सहायक नदी हुंजा नदी है, जिसके आसपास हुंजा घाटी विकसित हुई। यह घाटी प्रशासनिक रूप से काफी हद तक स्वतंत्र थी और यहां का शासक ‘मीर ऑफ हुंजा’ कहलाता था। हुंजा के लोग मुख्यतः पशुपालक थे और गर्मियों में अपने पशुओं को चराने के लिए शक्सगाम घाटी (Shaksgam Valley) का उपयोग करते थे। इस प्रकार शक्सगाम घाटी कभी हुंजा रियासत का मौसमी चारागाह हुआ करती थी।


1949 से चीन की नज़र शक्सगाम घाटी (Shaksgam Valley) पर

चीन की विस्तारवादी नीति कोई नई नहीं है। वर्ष 1949 में ही चीन ने अपने आधिकारिक नक्शों में पूरे गिलगित-बाल्टिस्तान (Gilgit Baltistan) क्षेत्र को, जिसमें शक्सगाम घाटी (Shaksgam Valley) भी शामिल थी, अपने देश का हिस्सा दिखा दिया था। पाकिस्तान ने इस पर आपत्ति जताते हुए पत्र लिखा, लेकिन चीन ने न तो नक्शा बदला और न ही कोई आधिकारिक जवाब दिया। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद 1963 में चीन और पाकिस्तान के बीच सीमा समझौता हुआ। इस समझौते के तहत पाकिस्तान ने शक्सगाम घाटी (Shaksgam Valley) चीन को सौंप दी। हालांकि समझौते में यह भी लिखा गया था कि जम्मू-कश्मीर विवाद का अंतिम समाधान होने पर इस क्षेत्र की स्थिति पर पुनर्विचार किया जाएगा, लेकिन चीन ने बाद में इस घाटी को पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले लिया।


शक्सगाम घाटी (Shaksgam Valley) का सामरिक महत्व क्या है?

यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जहां न कोई आबादी है और न ही कोई आर्थिक गतिविधि, वहां इतनी भू-राजनीतिक हलचल क्यों है। इसका उत्तर इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति में छिपा है। शक्सगाम घाटी (Shaksgam Valley) दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर के काफी निकट स्थित है। दोनों के बीच की दूरी लगभग 100 किलोमीटर है। ऊंचाई के लिहाज से सियाचिन, शक्सगाम घाटी (Shaksgam Valley) से लगभग 1500 से 2500 मीटर अधिक ऊंचाई पर स्थित है, जिससे वहां से शक्सगाम क्षेत्र पर निगरानी रखना संभव हो जाता है। सैन्य दृष्टि से यह स्थिति अत्यंत संवेदनशील मानी जाती है।


Shaksgam Valley भारत के सामने चीन और पाकिस्तान की दोहरी चुनौती

चीन लंबे समय से भारत को रणनीतिक रूप से घेरने की नीति पर काम कर रहा है। नेपाल और बांग्लादेश में बढ़ती चीनी गतिविधियां और पाकिस्तान के साथ उसकी गहरी साझेदारी इसी रणनीति का हिस्सा हैं। शक्सगाम घाटी इस पूरे घेरे में एक महत्वपूर्ण कड़ी बनकर उभरती है। इस क्षेत्र में भारत के सामने एक साथ चीन और पाकिस्तान खड़े दिखाई देते हैं। जहां सियाचिन में भारतीय सैनिकों को अत्यंत कठिन परिस्थितियों में तैनात रहना पड़ता है, वहीं शक्सगाम घाटी का भूभाग तुलनात्मक रूप से चीन के लिए अधिक अनुकूल माना जाता है।


Shaksgam Valley भारत और चीन की आधिकारिक प्रतिक्रिया

शक्सगाम घाटी में चीन द्वारा स्थायी निर्माण किए जाने की खबरों के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने कड़ा विरोध दर्ज कराया और स्पष्ट रूप से कहा कि यह क्षेत्र भारत का अभिन्न अंग है। दूसरी ओर, चीन ने 1963 के चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते का हवाला देते हुए शक्सगाम घाटी पर अपना दावा दोहराया है। यह टकराव आने वाले समय में और गहराने की आशंका जता रहा है।


निष्कर्ष: क्या भारत अपने खोए हुए वैभव को पहचान पाएगा?

शक्सगाम घाटी (Shaksgam Valley) की कहानी केवल एक भूभाग की नहीं, बल्कि भारत के ऐतिहासिक और सामरिक भविष्य से जुड़ा सवाल है। एक समय था जब भारत की सीमाएं रूस और ईरान तक मानी जाती थीं। आज सबसे बड़ी चुनौती केवल जमीन खोने की नहीं, बल्कि अपने इतिहास और भू-राजनीतिक सच्चाइयों के प्रति जन-जागरूकता की कमी की है। यह विषय उसी जागरूकता को बढ़ाने का एक प्रयास है।

अंत में एक सवाल पाठकों और दर्शकों के लिए छोड़ा जाता है—
चीन किस आधार पर अपने पड़ोसी देशों की जमीन पर दावा करता है?

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