अस्तित्व की लड़ाई लड़ता बांग्लादेश का हिंदू समाज (hindus in bangladesh)

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rana pratap bairagi short dead in bangladesh

बांग्लादेश (Bangladesh) आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ लोकतंत्र की दुहाई तो दी जा रही है, लेकिन उसकी जड़ें निर्दोषों के रक्त से सींची जा रही हैं। विशेष रूप से, अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद से वहाँ के हिंदू अल्पसंख्यकों (hindus in bangladesh)पर जो कहर टूटा है, उसने मानवता को शर्मसार कर दिया है। यह केवल छिटपुट हिंसा नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित सांस्कृतिक और धार्मिक ‘क्लींजिंग’ (सफाया) की ओर संकेत करता है। हालात यह है कि 31 दिसंबर की रात में बांग्लादेश के शरीयतपुर जिले के केयूरभंगा बाजार, दामुद्य में दुकान बंद करके जाते समय भीड़ द्वारा पीट कर जलाए गए हिन्दू दुकानदार 50 वर्ष के खोकन चन्द्र दास की भी मौत हो गई। इतना ही नहीं, बांग्लादेश के जेसोर जिले के मोनीरामपुर में राणा प्रताप बैरागी नामक युवक की गोली मार कर हत्या कर दी गई। यह उन हजारों घटनाओं ेमें से एक है जो बांग्लादेश में हिन्दुओं के खिलाफ लगातार हो रही हैं।

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shopkeeper khokan chandra das was attacked and then burnt live in bangladesh

अगस्त 2024 से बढ़ा तबाही का सिलसिला

बांग्लादेश में हिन्दुओ (hindus in bangladesh)के उपर अत्याचार का सिलसिला तो आजादी से पहले ही चल रहा था। बांग्लादेश में शामिल जिलों में बड़े बडे सांप्रदायिक दंगों का लंबा इतिहास रहा है। आजादी के बाद यह दंगे सामूहिक हत्याओं में बदल गए। 1951 में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान जो बाद में बांग्लादेश बना, उसमें 28 प्रतिशत हिन्दू रहा करते थे जो अब मात्र आठ प्रतिशत रह गए हैं। 5 अगस्त 2024 को सत्ता परिवर्तन के साथ ही यह हिंसा चरम पर पहुंच गई है।

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हालात यह है कि बांग्लादेश के 64 में से 50 से अधिक जिलों में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा चल रही है। आंकड़ों के अनुसार, केवल अगस्त के पहले तीन हफ्तों में ही **2,000 से अधिक सांप्रदायिक घटनाएं** दर्ज की गईं। मंदिरों को अपवित्र किया गया, इस्कॉन जैसे शांतिप्रिय केंद्रों पर हमले हुए और सैकड़ों घरों व व्यापारिक प्रतिष्ठानों को राख के ढेर में बदल दिया गया। यह सिलसिला यहीं नहीं रुका; हालिया महीनों (2025 तक) में भी ईशनिंदा के झूठे आरोपों में **दीपु चंद्र दास** जैसे निर्देशों की सरेआम लिंचिंग की गई।  मयमनसिंह के मेहराबारी में बजेंद्र बिस्वास (42) को गोली मार दी गई। इससे पूर्व अमृत मंडल, काम देव दास आदि की हत्या कर दी गई थी।

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इस्लामी कट्टरवाद की गिरफ्त में Bangladesh

बांग्लादेश में हिन्दुओं पर लगातार हो रहे इन हमलों के पीछे कोई अज्ञात चेहरा नहीं, बल्कि बांग्लादेश में सक्रिय **हिफ़ाज़त-ए-इस्लाम** और **जमात-ए-इस्लामी** जैसे कट्टरपंथी संगठन हैं। ये समूह न केवल हिंदुओं को निशाना बना रहे हैं, बल्कि बांग्लादेश के उस ‘धर्मनिरपेक्ष’ ताने-बाने को भी उधेड़ रहे हैं जिसके आधार पर इस देश का निर्माण हुआ था। सोशल मीडिया पर फेक न्यूज और ईशनिंदा के दावों को हथियार बनाकर भीड़ को उकसाना इन कट्टरपंथी समूहों की एक सोची-समझी रणनीति बन चुकी है। शेख हसीना के कार्यकाल में इन संगठनों पर प्रतिबंध था। इनके अधिकांश पदाधिकारी जेल में थे।

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मो यूनुस ने तख्तापलट के बाद सत्ता संभालते है प्रतिबंध को समाप्त कर सारे मुकदमे वापस ले लिए और आतंकवाद समेत तमाम गंभीर आरोपों में बंद सभी को रिहा कर दिया। इसके बाद सत्ता के विरुद्ध शुरू हुआ संघर्ष सीधे सनातन हिन्दुओं के खिलाफ भीषण आक्रमण में बदल गया। इसके बाद पूरे देश में हिन्दुओं पर संगठित हमले तेज हो गए। जमात ए इस्लामी क्या चीज है, कितनी खतरनाक है जरा इन पर शोध करने वाले डा अभिनव पांड्या को सुनिए।

कट्टर आक्रांताओं की समर्थक बनी केयरटेकर सरकार

 बांग्लादेश में अगस्त 2024 में बनी मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली **अंतरिम (केयरटेकर) सरकार** हिन्दुओं पर हो रहे इन हमलों को रोकने में विफल रही है। इसकी जगह सरकार और प्रशासन द्वारा अक्सर इन हमलों को ‘राजनीतिक’ रंग देकर खारिज कर दिया जाता है। हालात यह है कि चिन्मय कृष्ण दास जैसे हिंदू नेताओं की गिरफ्तारी और उनके समर्थकों पर पुलिसिया कार्रवाई की गई पर जमात के लोगों को मुक्त रखा गया है। यूनुस सरकार हिन्दुओं की हो रही सामूहिक हत्याओं व उत्पीड़न को स्वीकार तक करने को तैयार नहीं है, रोकने की बात तो दूर रही।

hindu lives matter in bangladeshबांग्लादेश (Bangladesh) की आजादी में हिन्दुओं (hindus in bangladesh) की महत्वपूर्ण भूमिका

बांग्लादेश के कट्टरपंथी पूरे देश को इस्लामी झंडे के तले लाना चाहते हैं। इसके लिए वह हिन्दुओं को इस्लाम स्वीकार करने या देश छोड़ देने की धमकी दे रहे हैं। इन कट्टरपंथियों को शायद 1971 का इतिहास याद नहीं। बांग्लादेश की आजादी के लिए लड़े गए **मुक्ति संग्राम** में हिंदुओं ने कंधे से कंधा मिलाकर अपना बलिदान दिया था। 1971 के नरसंहार में शहीद होने वाले 30 लाख लोगों में एक बहुत बड़ा हिस्सा हिंदुओं का था। जिस ‘सोनार बांग्ला’ का सपना मुजीबुर्रहमान ने देखा था, उसकी नींव में हिंदुओं का रक्त और पसीना भी शामिल है। आज उन्हें ही विदेशी या दुश्मन करार देना ऐतिहासिक कृतघ्नता की पराकाष्ठा है। आज कट्टरपंथी उसी भारत को आंखे दिखा रहे हैं, जिसने पाकिस्तान के अत्याचार के दिनों में उन्हें अपने यहां शरण दी थी। साथ ही उन्हें एक स्वतंत्र देश बना कर दिया था।

इस स्थिति के पीछे  बांग्लादेश में सक्रिय **हिफ़ाज़त-ए-इस्लाम** और **जमात-ए-इस्लामी** जैसे कट्टरपंथी संगठन हैं। यह संगठन बांग्लादेश की आजादी के पहले भी खिलाफ रहे हैं और पाकिस्तान के कट्टर समर्थक रहे हैं। जमात और इन संगठनों पर मैं बहुत जल्द ही एक वीडियो बनाऊंगा। यह ऐसे संगठन हैं, जिनकी हरकतों के बारे में हर सनातनी को अवश्य जानना चाहिए।

हिन्दुओं (hindus in bangladesh) की एकजुटता ही बचाव का एक मात्र रास्ता

 बांग्लादेश में सिमटती हिंदू आबादी 1971 में 20% थी और अब मात्र 8% रह गई है। यह स्थिति एक गंभीर चेतावनी है। अब समय केवल ‘कड़ी निंदा’ करने का नहीं है। बांग्लादेशी हिंदुओं के अस्तित्व को बचाने के लिए भारत समेत पूरे विश्व के हिंदुओं को एक सुर में आवाज उठानी होगी। अंतरराष्ट्रीय संगठनों को इस मानवाधिकार हनन पर दबाव बनाना होगा। यदि आज सनातन समाज एकजुट होकर अपने भाइयों के लिए खड़ा नहीं हुआ, तो इतिहास हमें कभी क्षमा नहीं करेगा। पाकिस्तान व बांग्लादेश में कुल करीब दो करोड़ हिन्दू हैं। भारत समेत विश्व भर में फैले 140 करोड़ हिन्दुओं को इनके समर्थन में एक जुटता के साथ खड़े होना जरूरी है।
**’एक’ होना अब विकल्प नहीं, बल्कि जीवित रहने की अनिवार्यता है।**

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